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जाने भगवान कौन है कैसे दिखते है? जरूर जाने इस रहस्य को.

 

जय श्री कृष्ण दोस्तों  - बहुत से लोगो के मन में प्रश्न(सवाल ) आता है कि भगवान कहाँ हैं ,क्या सचमुच भगवान होते है? और जब ईश्वर निराकार है तो उसका कोई रूप कैसे हो सकता है? क्या सच  में किसी ने भगवान को देखा है तो उस निराकार भगवान का रूप  कैसे होगा ? ऐसे बहुत से प्रश्न अक्सर आपके मन में आते होंगे। 

 भगवान विष्णु ,शिव ,ब्रह्मा ,राम कृष्णा सबके अलग -अलग रूप है तो इसमे से वो कौन है जो सबसे शक्तिमान और  परब्रह्म है। 

हर धर्म में भगवान को एक ही बताया गया है परन्तु सनातन धर्म में अनगिनत धर्म के भगवान है. तो ये कैसी पहेली है?
हम कैसे जाने हम कैसे पता करे वो सर्वशक्तिशाली और परब्रह्म कौन है?उसका नाम क्या है ?  उसका क्या स्वरूप है उसका कैसा अकार है? या फिर वो भयावह है?
दोस्तों हमसे किसी ने भी उस परब्रह्म ईश्वर को नहीं देखा तो नहीं है परन्तु गीता में उस परमात्मा  रूप का वर्णन विस्तार से  किया गया है हम सभी ने महाभारत सीरियल में भगवान के विराट रूप को देखा होगा।  परन्तु केवल देखने मात्र  से  उस परम् ईश्वरीय स्वरूप को समझना सम्भव नहीं है। 
 इसलिए आज हम आपको उस ईश्वरीय स्वरूप के बारे में समझाने की कोशिश करेंगे जिसके बारे में आप शायद ही  जानते होंगे। 
दोस्तों महाभारत  युद्ध में जब अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण को  उनके ईश्वरीय स्वरूप को दिखाने की प्रार्थना की तब भगवान कृष्ण ने कहा - हे प्रार्थ अब तुम मेरे सैकड़ो ,हजारों ,नाना प्रकार और नाना वर्ण तथा नाना आकृति वाले मेरे अलौकिक रूप को देखो। 
इसके बाद भगवान श्री कृष्ण  ने अर्जुन को दिव्यदृष्टि  दी।  और जिस सर्वशक्तिशाली ईश्वर  परब्रह्म को अर्जुन के द्वारा  देखा गया उसका वर्णन इस प्रकार से है आप ध्यान से पढ़े। 

सर्वशक्तिमान परब्रह्म ईश्वर के रूप को देखकर अर्जुन कहता है ,हे प्रभु आपके अनेक मुख मुझे दिखाई दे रहे है .
और में चद्रमा  सूर्य को आपके दोनों  आँखों के स्थान पर  देख रहा हूँ।इस विराट स्वरूप  में मुझे सब ओर से आपके असंख्य मुख दिखलायी दे रहे है। उनमे आपका जो पहला मुख है उस मुख पर नेत्रों के स्थान में मैं चन्द्रमा और सूर्य को देख  रहा हूँ। 
अर्जुन कहे रहे है - हे सर्वशक्तिमान आप दिव्य आभूषण धारण किये हुए है , आप अनेक भुजाओं में अनेक शस्त्र धारण किये हुए है।  शरीर का कोई ओर छोर मुझे नजर नहीं आ रहा है,मुझे आप आकाश से भी ऊंचे दिखाई दे रहे है। हे सर्वशक्तिमान में आपको चारों ओर से देख पा रहा हूँ मुझे आप हर ओर से मुकुट धारण किये हुए दिख रहे है,  और आपकी परम् देह से मुझे दिव्या सुगंध आ रही है ,यदि आकाश में एक हजार सूर्य भी एक साथ उदय हो जाए तो भी ऐसा प्रकाश उत्तपन  नहीं हो सकता है जैसा प्रकाश आपके दिव्या रूप से आ रहा है। 
फिर अर्जुन आगे कहता है - हे देव मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवो और भूतों के समुदाय को देख रहा हूँ ,और मै आपके ह्रदय में कमल के आसन में विराजमान ब्रम्हा और शिव को देख रहा हूँ।  11 रूद्र और 12 आदित्य तथा 8 वसु भी मैं आपमें देख रहा हूँ। 
संपूर्ण ऋषि और दिव्य सर्प भी मुझे आप में दिखाई दे रहे है , मुकुट पहने आपके मुख चारों ओर से दिखाई दे रहे है आप गदा और चक्र धारण किये हुए है,आपका मुख अग्नि समान प्रतीत हो रहा है. हे सर्वशक्तिमान मैं समस्त देवताओं और ब्रह्माण्ड को आपके मुख में देख सकता हूँ . हे ईश्वर मुझे न तो आपका अंत दिख रहा है न आपका मध्य। मुझे अनंत तक आपका ही विशाल रूप नजर आ रहा है। जिसका कोई अंत नहीं है।





सर्वशक्तिमान ईश्वर के स्वरूप को इतनी देर तक दखने के बाद अब अर्जुन भयभीत होने लगा और कहता है हे विष्णु आकाश को स्पर्श करते हुए आपके इस स्वरूप में अनेकों रंग प्रकाशवान है। आपके  विशाल  मुख को फैलाये हुए और आपकी चमकती हुई बड़ी -बड़ी आँखों को देखकर मेरा मन भयभीत हो रहा है।  मैं धर्य  धारण नहीं कर पा रहा हूँ और मैं ही नहीं तीनों  लोकों में आपका मुख अग्नि  सामान प्रजावलित है .
आपके विकराल दहाड़ो के कारण ये और प्रलयकारी प्रतीत हो रहा है। 
हे  सर्वशक्तिशाली आपके मुखों को देखकर में सभी दिशाओं को भूल चूका हूँ। 
इसलिए हे देवेश हे सर्वशक्तिशाली आप प्रसन्न हो। 
अर्जुन आगे कहता है -   कौरव वंश के सभी पुत्र और राजाओं के समुदाय ,भीष्म पितामह ,कर्ण ,द्रोणाचार्य और हमारे पक्छ के भी प्रधान योद्धा आपके मुख में प्रवेश कर रहे है। आपकी भयानक और विकराल दहाड़ो में  सभी के सिर नष्ट हो रहे है। भगवान के विराट रूप को  हर ओर से देख लेने के बाद हर ओर से कांप रहे अर्जुन को ये समझ नहीं आया कि ये श्री कृष्ण ही है या कोई और। 
अर्जुन का धैर्य अब जवाब दे गया और अर्जुन  ने फिर पूछा - हे सर्वशक्तिमान उग्र रूप वाले आप कौन है। 
हे देवों में  श्रेष्ठ आपको नमस्कार आप प्रसन्न होइए ,और मुझे अपना परिचय दीजिये , अर्जुन की ये बात सुनकर भगवान बोले - मैं सभी लोकों का नाश करने वाला बड़ा हुआ महाकाल हूँ ,भगवान के कथन का अभिप्रया: यह है कि मैं संपूर्ण जगत का सृजन ,पालन और संघार करने वाला परम परब्रह्म  परमेश्वेर ईश्वर हूँ।  तुम मुझे इस समय इन  सबका संहार करने वाला काल समझो। 


ईश्वर का विस्तृत महाकाल स्वरूप का वर्णन करने के बाद अर्जुन कहता है - वायु ,यमराज ,अग्नि ,वरुण ,चन्द्रमा और प्रजापति ब्रह्म आप ही है। 
हे अनंत सामर्थ्य वाले आपको आगे से भी और पीछे से भी मेरा प्रणाम है , हे सर्वआत्मा आपके लिए सब ओर से नमस्कार क्योंकि आप सर्वरूप है हजारों बार आपको मेरा नमस्कार। 
अर्जुन आगे कहता है - हे सर्वशक्तिमान पहले कभी न दिखे आपके आश्चर्यजनक रूप को देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ ,परन्तु मेरा मन भय से व्याकुल हो रहा है।   इसलिए आप मुझे अपना विष्णु चतर्भुज रूप दिखाए ,हे देवेश हे सर्वशक्तिमान  प्रसन्न होइए ।   
 इसके बाद भगवान बोले हे अर्जुन मैंने अपने योगशक्ति के प्रभाव से अपना परम् तेजोमय सभी सीमाओं से परे जिस विराट रूप को तुझे दिखाया है ,उसे तेरे अतिरिक्त पहले किसी ने नहीं देखा है।
मनुष्य लोक में इस प्रकार के विशाल रूप वाला मेरा ये रूप कोई न तो वेद के अध्ययन से देख सकता है और न ही यज्ञ से , न दान से ,न किसी भी क्रिया से न उग्र तप से। 
तेरे अतिरिक्त मेरा या स्वरूप दूसरा कोई नहीं देख सकता है ,मेरा विकराल रूप  देखकर तुझको व्यकुलता नहीं होनी चाहिए ,इसलिए तू अपना मन शांत कर।  और भयभीत होकर मेरे शंख ,चक्र ,गदा -पदयुक्त चतुरभुर्ज रूप  दर्शन कर। 
इस तरह भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपने चतुरभुर्ज स्वरूप का दर्शन कर पाया और तब जाकर अर्जुन का मनचित शांत हुआ ,और भयमुक्त हुआ।  
तो दोस्तों इसमे हमने आपको गीता के माध्यम से आपको भगवान के विराट रूप के वर्णन को आपको समझाने की कोशिश की है आशा करते है आप भगवान के बारे में समझे होंगे।  









  



    



 

 
 
 
















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