केदारनाथ धाम के बारे में
केदारनाथ धाम उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है जो की बहुत ही खूबसूरत जगह है यह चारों तरफ विशाल पहाड़ और नदियाँ है और पहाड़ बर्फ से ढकी रहती है जो दिखने में एक स्वर्ग जैसा प्रतीत होता है।
उत्तराखंड में भगवान शिव का सबसे बड़ा मंदिर केदारनाथ धाम में स्थित है जो बैल की पीठ के रूप ( शिवलिंग) के रूप में पूजा जाता है।
कहते है दोस्तों जब पांडव महाभारत का युद्ध जीत चुके थे तो पांडव अपने भाइयों की हत्या के पाप से मुक्ति के लिए भगवान शिव के पास जा रहे थे परन्तु भगवान शिव शंकर पांडव से क्रोधित थे।
जब पांडव भगवान शिव शंकर से मिलने काशी गए तो भगवान भोले शंकर फिर पांडव को देख कैलाश चले गए .परन्तु भोले नाथ का पीछा करते -करते पांडव कैलास भी पहुँच गए परन्तु फिर भोलेनाथ केदार चले गए और वहां एक बैल का रूप ले लिया और बैलों के समूह में जाकर मिल गए ।
पांडव को भगवान शिव शंकर पर संदेह हो गया कि - शिव शंकर ने बैल रूप धारण किया है इसलिए भीम ने अपना विशाल रूप धारण किया और दो पहाड़ों के बीच अपने पैरों को चौड़ा कर दिया. कहते है बाकि सभी गाय भीम के पैरों के बीच से चले गयी थी परन्तु भगवान भोले शंकर भीम के पैरों के बीच से नहीं गए और तब उसी जगह पर अंतर्ध्यान होने लगे परन्तु भीम ने भगवान भोले शंकर की बैल रूप की पीठ पकड़ ली जिस कारण शिव शंकर के बैल रूप के पीठ की पूजा शिवलिंग के रूप में होती है। फिर बाद में ये सब देखकर भगवान शिव शंकर पांडव की भक्ति को देखकर खुश हो गए और पांडव को भाइयों की हत्या के पाप से मुक्त किया।
दोस्तों आपकी जानकरी के लिए बता दे यदि आप केदारनाथ मंदिर को एक ही समझ रहे तो आप गलत हो क्योंकि ये केदारनाथ पंच केदार से मिलकर बना हुआ है जिसको केदारनाथ कहा जाता है। मतलब भगवान शिव शंकर के शरीर के अंग पंच केदार में अलग -अलग जगह पड़े है इन सबको ये मिलाकर केदारनाथ कहलाता है। कहते है दोस्तों पांडवों ने अपनी स्वर्ग यात्रा यहां से ही शुरू की थी और अपने अस्त्र शस्त्र पांडव ने भगवान भोले शंकर के सामने त्यागे थे क्योंकि स्वर्ग यात्रा में अपना सब कुछ त्यागना पड़ता है काम ,मोह ,लोभ ,अस्त्र शस्त्र सब कुछ। परन्तु धर्म राज युधिष्ठिर के अलावा सभी भाई और द्रोपदी मृत्यु को प्राप्त हुए और केवल युधिष्ठिर ही जिन्दा स्वर्ग गए।
कहते है दोस्तों केदारनाथ के गर्भ गृह के बाहर पांडवों की मूर्ति के अलावा द्रोपदी की भी मूर्ति है और उनकी भी पूजा की जाती है।
शास्त्रों के अनुसार ये मंदिर पांडवों ने बनाया था परन्तु कहते है बाद में आदिशंकराचार्य ने इस मंदिर का पुननिर्माण कराया। और दोस्तों मंदिर को कत्यूरी शैली में बनाया गया है और यहां की पूजा शैव समुदाय के पुजारी करते है। केदारनाथ मंदिर के ऐसे बहुत सी कथा या घटना है जो मंदिर के निर्माण के अलग -अलग दावा करते है।
कहते है केदार में नर और नारायण ने घोर तपस्या की थी और नर और नारायण की तपस्या से खुश होकर भगवान शिव शंकर ने नर और नारायण को अपने दर्शन दिए और सदा के लिए केदार में ही शिवलिंग रूप में विराजमान हो गए।
कब जाना चाहिए केदारनाथ धाम
दोस्तों वैसे तो अभी 2021 में कोरोना और ब्लैक फंगस जैसी महामारी के कारण यात्रा नहीं की जा रही है परन्तु फिर भी हम आपको बता दे यदि आप भविष्य में आप केदारनाथ जाना चाहे तो आप मई से अक्टूबर के बीच भगवान केदारनाथ के दर्शन करने जा सकते हो क्योंकि इस दौरान मौसम अच्छा रहता है और दोस्तों मंदिर के कपाट वैसे भी गर्मियों में ही खुलते है क्योंकि भारी बर्फबारी के कारण मूल निवासी यहां से चले जाते है और फिर गर्मियों में आते है।
इस बार 2021 में बाबा केदारनाथ धाम कपाट 17 मई को खुलेंगे और आपकी जानकारी के लिए बता दे कि - बाबा बद्रीनाथ के 18 मई को खुलेंगे।
केदारनाथ में भगवान शिव की पूजा किस रूप में होती है
उत्तराखंड के केदारनाथ धाम मंदिर में भगवान शिव की पूजा विग्रह रूप में होती है यह पीठ जैसा त्रिकोणाकार रूप में है इसको भगवान शिव शंकर के बैल रूप भी कहा जाता है और इसी बैल रूप के पीठ की पूजा शिवलिंग रूप में होती है। और शिवलिंग का रहस्य पांडवों से जुड़ा हुआ है।
केदारनाथ कैसे जाए
आप केदारनाथ भारत के किसी भी जगह से हवाई सेवा हेलीकॉप्टर से ,गाड़ी ,बस ,कार रेल से जा सकते है परन्तु आपको रेल ऋषिकेश तक मिलेगी ऋषिकेश के बाद आपको अपनी स्वयं की गाड़ी या बस में ही केदारनाथ जाना पड़ेगा क्योंकि अभी केदारनाथ मार्ग के लिए रेलमार्ग तैयार नहीं हुआ परन्तु अब कुछ सालों में ऋषिकेश से लेकर गौचर (रुद्रप्रयाग )तक रेल मार्ग का कार्य किया जा रहा है जो की कुछ सालों में पूरा हो जायेगा।
भगवान शिव का नाम केदारनाथ कैसे पड़ा
कहते है दोस्तों राजा केदार भगवान शिव शंकर के बहुत बड़े भक्त थे और राजा केदार का भगवान शिव पर अटूट श्रद्धा थी। कहते है राजा केदार और केदारखंड के रक्षक के रूप में भगवान शिव का ज्योतिलिंग प्रकट हुआ था जिस कारण भगवान शिव का नाम केदारनाथ पड़ा और कहते है तभी से भगवान शिव शंकर को केदारनाथ के नाम से जाना जाता है। और केदारनाथ 12 ज्योतिलिंग में से एक ज्योतिलिंग है और सबसे महत्वपूर्ण ज्योतिलिंग ये ही माना जाता है।
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